सिरोसिस आफ लिवर (Liver Disease)

Dr.VIRENDRA AGARWAL
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विश्व में सिरोसिस आफ लीवर रोगियों की संख्या बढती जा रही है एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब 5 प्रतिशत लोग सिरोसिस आफ लिवर के शिकार है ।
इस रोग में लीवर (यकृत) की नलियों के मार्ग में लचकदार सौत्रिक ततुं इस कदर पैदा हो जाता है की यकृत की जो कोशिकायें पाचक रस उत्पकन कर रही थी नष्ट हो जाती है या दब जाती है फलस्वरूप मुख्यि कोशिकाओं व शिराओं में रक्त‍ के आने जाने में बाधा पड जाती है ।
यह प्राय: दो प्रकार का होता है -
(1) मल्टीलोबुलर Multilobular
(2) यूनीलोबुलर Unilobular
किसी भी प्रकार का सिरोसिस आफ लीवर निम्न कारणों के कारण पनपता है ।

1. मदिरा का अधिक सेवन
2. लम्बे समय तक कब्ज व एसिडिटी
3. मलेरिया, खसरा, पेचिश आदि सक्रामक रोग पनपने के बाद
4. तिल्ली का बढ जाना व खून की कमी
5. स्टेलराइड व दर्द निवारक दवाओं का प्रयोग के कारण
6. रिकेटस, क्षय रोग, हद्वय रोग आदि स्थितियों में भी पनप जाता है ।

इस रोग में निम्न‍ लक्षण उत्पन्न होते है -

हीमोग्लोबिन प्लेटलेटस एल्बू्मिन तापक्रम पेशाव सूजन भूख जीभ
10 से कम 70,000
से कम
++ 101 एफ Yellow Red पेट पैर व
एडी तलवों
कम व
मर ज्ञाती है
सफेद व
पीली
इस रोग में रोगी की हालत बदर हो जाती है पेरों में सूजन आ जाती है तिल्ली का आकार बढ जाता है, पेशाव कम आने लगता है भूख मर जाती है, शरीर का रंग बदल जाता है आदि लक्षण प्रकट होने लगते है ।
सिरोसिस आफ लिवर ठीक होने वाली बीमारी है यकृत अपने आप में पुनरूद्व भवन की क्षमता रखता है यकृत की कोशिकायें स्वयं ठीक होना जानती है । यकृत की जो कोशिकायें नष्ट हो गई है उनकी जगह नई कोशिकायें बनने की क्षमता यकृत के पास होती है ।

यकृत को पूर्ण रूप से ठीक करने के लिए निम्ने उपचार करने होगें ।

1.गर्म ठन्डा सेक :-यकृत का गर्म ठन्डा सेक अतयन्तं प्रभावकारी उपचार है 4 मिनट गर्म 2 मिनट ठन्डा करीव दिन में पाच से छ: बार से करने पर नष्ट व दबी कोशिकायें ठीक होने लगती है गर्म ठन्डे सेक द्वारा लीवर पर रक्त का दबाब तेजी से पडता है फलस्वरूप यकृत तेजी से कार्य कर अपने को ठीक करने में लग जाता है ।
2. मिटटी पटटी एनीमा :-यकृत व पेट की मिटटी पटटी यकृत पर संकुचन पैदा कर विषाक्तट तत्वों को बाहर निकालने में मदद करती है नीम गिलोम व छाछ का एनीमा आंतों की सफाई कर पाचक रसों के स्त्राव को बढाकर तिल्ली के आकार को कम करने में मदद करता है ताकि सक्रामक रोग का खतरा टल सके ।
3. आहार :-इस रोग में आहार की महत्वपूर्ण भूमिका है । इस रोग में नमक, मिर्च, एल्कोहल, ध्रुमपान व रासायनिक दवाओं के सेवन से परहेज रखना जरूरी है इस रोग में अनार, पपीता, ज्वा रे का रस, नीम गिलोय का सत, आवला महत्वरपूर्ण है । इस रोग में यदि रोगी 60 दिन का फलाहार व रसाहार उपवास करता है तो आशातीत लाभ मिलता है।

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